सकारात्मक सोचें

Positivity

सकारात्मकता, सकारात्मक चीजों को और नकारात्मकता, नकारात्मक चीजों को आकर्षित करती है।  हम अपने आस पास रोज बहुत से चेहरे देखते है। नाखुश चेहरों  को देखकर नकारात्मकता का अनुभव होता है और खुश चेहरे, किसी और के चेहरों पर भी मुस्कराहट बिखेर देते है। जो लोग हमेशा प्रसन्न चित्त रहते है, ऐसा नहीं है की उनकी जिंदगी में कोई दुःख नही होता ? दुःख, तकलीफ हर व्यक्ति के जीवन में होता है पर प्रसन्न चित्त व्यक्ति हमेशा चीजों को सकारात्मक नजरिये से देखते है और प्रायः खुश रहने की कोशिश करते है। हर सिक्के के दो पहलू होते है और यह हमारे नजरिये पर निर्भर करता की हम क्या देखते है।

इस बात को हम एक छोटी सी कहानी के माध्यम से अच्छे से समझ सकते है –

एक प्रसिद्ध लेखक थे वे अपने अध्ययन कक्ष मे बैठे थे। उन्होंने अपनी कलम उठाई और अपने गुजरे हुए लम्हों के बारे में लिखना शुरू किया –
“पिछले साल, मेरे घुटनो की सर्जरी हुई जिसकी वजह से मैं लंबे समय तक बिस्तर पर था, और काफी समय तक कहीं चल फिर नहीं भी सकता था।  उसी वर्ष मैं ६०  वर्ष की आयु तक पहुँच गया था और मुझे सेवानिवृत्त होना पड़ा, और अपनी पसंदीदा नौकरी का त्याग करना पड़ा। मैंने अपने जीवन के ३४  साल उस कंपनी में बिताए थे।  उसी वर्ष मैंने अपनी माँ की मृत्यु के दुःख का अनुभव किया। और उसी वर्ष मेरी बेटी एक कार दुर्घटना की वजह से अपनी मेडिकल परीक्षा में असफल हो गई । उसे कई दिनों तक अस्पताल में रहना पड़ा। और कार के छतिग्रस्त होने से एक और नुकसान हमें उठाना पड़ा।”

अंत में उन्होंने लिखा: हे भगवान! यह बहुत बुरा साल था !!

उसी समय लेखक की पत्नी ने कमरे में प्रवेश किया, उसने पाया कि उसका पति गम में हैं और बहुत उदास दिख रहा है। लेखक अपने ही विचारों में खो गया था। लेखक की पत्नी ने पढ़ा लिया कि कागज पर क्या लिखा है। वह चुपचाप कमरे से चली गई और थोड़ी देर बाद एक  दूसरे पेपर के साथ वापस आई और उस पेपर को अपने पति के लिखे हुए कागजो के ऊपर दिया।

उसके बाद लेखक ने उस पत्र को देखा, जिसे उसकी पत्नी ने निम्नलिखित पंक्तियों के साथ लिखा था –
“पिछले साल मैंने आखिरकार अपने घुटनों के दर्द से छुटकारा पा लिया था जिसके कारण मैंने वर्षों तक दर्द में बिताया था …।
मैंने सामान्य स्वास्थ्य के साथ ६० वर्ष की उम्र में काम किया और अपनी नौकरी से सेवानिवृत्त हो गया। अब मैं अपने समय का सदुपयोग कर सकता हूं  और, और अधिक ध्यान और शांति के साथ कुछ बेहतर लिख सकता हूँ। उसी एक ही साल में मेरी माँ, 92 साल की उम्र में, बिना किसी पर निर्भर हुए और बिना किसी दयनीय स्थिति में गए, चलते फिरते पंचतत्व में विलीन हो गयी।  उसी वर्ष, भगवान ने मेरी बेटी को एक नए जीवन का आशीर्वाद दिया। मेरी कार नष्ट हो गई लेकिन मेरी बेटी बिना किसी विकलांगता के जिंदा रही।
अंत में उसने लिखा: हे भगवान! यह वर्ष एक अपार आशीर्वाद था और यह बीत गयाबहुत अच्छा !!!

लेखक इस तरह की सुंदर और उत्साहजनक व्याख्या पर बहुत खुश था  और उस वर्ष उनके जीवन में होने वाली घटनाओं पर आश्चर्यचकित था ।

दैनिक जीवन में हमें यह देखना चाहिए कि यह खुशी नहीं है जो हमें कृतज्ञ बनाती है बल्कि यह कृतज्ञता और आंतरिक शांति है जो हमें खुश करती है।

सकारात्मक सोचें …. खुश रहें ….

 

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