ज़िंदगी की साइकिल – बचपन की यादें और सीख

ज़िंदगी की साइकिल 🚲 – बचपन की यादें और सीख

सात आठ साल की उम्र में हम लोग गर्मियों की छुट्टियों में पिता जी की बड़ी सी साइकिल चुपके से बाहर निकाल कर ले जाते थे। उस समय वह साईकिल मिल जाना बहुत बड़ी बात लगती थी। इतनी ख़ुशी होती थी की उसे बयां करने के शब्द नहीं हैं।

चलाना तो आता नहीं था, उसे पैदल ही  दौड़ाते थे। शुरू शुरू में पैदल लेकर दौड़ना भी मुश्किल होता था। क्योंकि कई बार हैंडल टेढ़े हो जाने ले कारण साईकिल उलट जाती थी, और पैर में चोट भी लग जाती थी। पास पड़ोस के बच्चे भी साथ में दौड़ते थे।

नियम था की हर लड़का बारी बारी से अपने घर से साईकिल लेकर आएगा। और सबको बारी बारी से उसे दौड़ाने का मौका मिलता।

पैदल दौड़ाते दौड़ाते धीरे धीरे कैंची चलाना सीख गए।  बाद में डंडे को पार करने का कीर्तिमान बनाया, इसके बाद सीट तक पहुंचने का सफर एक नई ऊंचाई था। धीरे धीरे चलाना इतना आसान हो गया की पहले अकेले फिर दो को बैठाकर और धीरे धीरे हाथ छोड़कर चलाने में माहिर हो गए। इतना ही नहीं कैरियर पर बैठकर साइकिल के खेल करने भी सीख गए।

ख़ैर जिंदगी की साइकिल तो अभी भी चल रही है। बस वो दौर और वो आनंद नही है

क्योंकि कोई माने न माने पर जवानी से कहीं अच्छा वह खूबसूरत बचपन ही हुआ करता था, जिसमें दुश्मनी की जगह सिर्फ एक कट्टी ही  हुआ करती थी और सिर्फ दो उंगलिया जुडने से दोस्ती फिर शुरू हो जाया करती थी। अंततः बचपन एक बार निकल जाने पर सिर्फ यादें ही रह जाती है और वो यादें अक्सर उम्र के हर मोड़ पर मन को विह्वल कर देती है।

इस आधुनिक दौर में आज के बच्चो का बचपन तो मोबाईल चुराकर ले गया।

📜कहानी से सीख (Moral of the Story): 

  • धैर्य और अभ्यास – 
    जीवन में हर कौशल धीरे-धीरे आता है, इसलिए अभ्यास और धैर्य जरूरी है।

  • संतुलन बनाए रखना – 
    बचपन की साइकिल की तरह, जीवन में संतुलन बनाना सीखें।

  • सच्ची दोस्ती – 
    छोटी-छोटी बातों से दोस्ती बनती है और रिश्ते मजबूत होते हैं।

  • बचपन की यादें संजोएं – 
    बचपन की खुशियों को हमेशा याद रखें, क्योंकि यही जीवन का सबसे सुंदर हिस्सा है।

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