🌻 सफलता की दौड़ और बेचैन मन
संतोष ही असली सुख है – आज की दुनिया में हर इंसान किसी न किसी दौड़ में शामिल है — कोई ज्यादा पैसा कमाने की दौड़ में, कोई बड़ा मकान या कार खरीदने की होड़ में।
हर किसी को जल्दी से जल्दी सब कुछ चाहिए। लेकिन इस “जल्दी पाने” की चाह ने लोगों के मन से शांति और संतोष छीन लिया है।
सच तो यह है कि जीवन की बुनियादी जरूरतें बहुत साधारण हैं — खाने के लिए रोटी, पहनने के लिए कपड़े और रहने के लिए एक घर।
अगर ये चीजें मन की शांति के साथ मिल जाएं तो जीवन बहुत सुंदर और पूर्ण बन जाता है।
मन की भूख – जो कभी नहीं भरती
परन्तु इंसान के पास पेट की भूंख से ज्यादा मन की भूंख है जो कभी भरती ही नहीं है। चाहे जितनी ज्यादा धन सम्पदा वो इकठ्ठा कर ले, फिर भी उसका मन कभी नहीं भरता।
पेट भरने के लिए दो रोटी की आवश्यकता होती है, पर इंसान इतना विह्वल होकर कमाता है जैसे कि वो सैकड़ो सालों तक इस धरती पर रहने वाला है और सब कुछ अभी कमा के रख लेना है।
रहने के लिए एक छत चाहिए परन्तु वह बहुत बड़े मकान का सपना देखता है, मानलो उसका यह सपना पूरा हो भी जाता है और वह बड़ा मकान बना भी लेता है परन्तु सोता तो एक कमरे में एक बिस्तर पर ही है।
फिर भी बहुत कुछ हासिल करने के बाद भी कहीं न कहीं उसके मन में एक नई कमीं हमेशा खटकती रहती है। और वह कमीं उसे कभी भी खुश नहीं होने देती।
भिखारी और अमीर की सोच में फर्क
एक भिखारी जिसके पास कुछ नहीं होता, वह दिनभर भीख मांगता है। भीख में मिली हुई चीजें पाकर वह खुश हो जाता है, ईश्वर को धन्यवाद देता है और ख़ुशी ख़ुशी भोजन खाकर डकार मारते हुए होते सो जाता है। उसके पास कम तो है परन्तु उसे कमीं दिखाई नहीं देती।
दूसरी तरफ एक इंसान जिसके पास कम तो नहीं है परन्तु उसे हमेशा एक नई कमीं दिखाई देती है और वह उसकी पूर्ति में लग जाता है। तत्पश्चात फिर से एक नई कमीं आ जाती है और इस प्रकार जीवन भर वो हमेंशा कमियों को पूरा करने में व्यस्त रहता है और उसके पास जो सुख संसाधन होते है वह उसका सुख भी नहीं ले पाता।
तुलना – असली दुख की जड़
अक्सर कमीं तब नजर आती है जब हम स्वयं की किसी और के साथ तुलना करते हैं। उसके पास वो है मेरे पास ये नहीं है, पडोसी के पास दो कार है मेरे पास तो एक ही है, फला रिश्तेदार के पास तो बहुत बड़ा मकान है मेरे पास तो इतना छोटा मकान है। और इस प्रकार उसके मन में कभी भी शांति नहीं आती।
भिखारी के पास कम है, परन्तु उसे कमीं इसलिए नहीं दिखाई देती क्योंकि वह कभी तुलनात्मक रवैया नहीं अपनाता।
संतोष – जीवन का असली धन
ईश्वर ने जो दिया है, वही हमारे लिए पर्याप्त है।
अगर हम उसमें खुशी ढूंढना सीख लें, तो जीवन अपने आप खूबसूरत हो जाएगा।
बेहतर करने की कोशिश जरूर करें, पर खुद को तनाव और जलन में डालकर नहीं।
कभी-कभी “थोड़ा कम” ही “बहुत ज्यादा” होता है — बस नजरिया बदलने की जरूरत है।
🌿निष्कर्ष (Nishkarsh):
इस दौड़ती-भागती दुनिया में मन की शांति सबसे बड़ी उपलब्धि है।
सफलता तब तक अधूरी है जब तक आप उसमें संतोष नहीं महसूस करते।
याद रखिए — “सुख धन से नहीं, संतोष से आता है।”
तो चलिए, आज से ही ईश्वर का धन्यवाद करें, जो है उसमें खुशी ढूंढें और जीवन को हल्के मन से जिएँ।

