दूसरों की खुशियों में अपनी ख़ुशी तलासने की आवश्यकता है  

 दूसरों की खुशियों में अपनी ख़ुशी तलासने की आवश्यकता है  gyanhans

दूसरों की खुशियों में अपनी ख़ुशी तलासने की आवश्यकता है 

एक गांव  में एक आदमी रहता था वह बहुत गरीब था। वह हमेशा भगवान से शिकायत करता रहता था की भगवन आपने मुझे कुछ दिया नहीं, सभी गांव वालों के पास कुछ न कुछ है पर आपने हमें सबसे गरीब बना दिया।

एक दिन भगवान प्रशन्न हुए और बोले तुम्हें क्या चाहिए बोलो। उस व्यक्ति ने ढेर सारे धन वैभव की इच्छा व्यक्त की। भगवान ने उससे कहा परन्तु एक सर्त है जो भी तुम मांगोगे और जो तुम्हें मिलेगा, उसका दुगना गांव वालों को मिलेगा।

इस पर उस व्यक्ति ने अपनी इच्छा से कम वस्तुयें और धन मांगे क्योंकि सर्त के अनुसार गांव वालों को उसका दुगना मिलेगा। भगवान ने उसे उसकी इच्छा अनुसार वरदान देकर चले गए।

वह व्यक्ति कुछ समय के लिए प्रशन्न हुआ परन्तु उसने देखा गांव वाले उससे ज्यादा संपन्न थे उनके पास ढेर सारी बस्तुएं  और सुख सुविधाएँ थी। यह सब देखकर वह व्यक्ति फिर से दुखी होने लगा। इस उसके बस्तुएं थीं धन धान्य भी थे परन्तु ईर्ष्या ने उसे दुखी कर दिया था। वह फिर परेशान रहने लगा और भगवन से शिकायत करने लगा।

भगवान फिर प्रकट हुए और उसके दुःख का कारण पूछने लगे। उसने कहा भगवान मेरे पास गांव वालों से कम धन है वस्तुएं है और गांव  वाले मुझसे ज्यादा सम्पन्न हैं। भगवान ने कहा – तुम्हारे पास जब कुछ नहीं था तो तुम दुखी थे वह सही था परन्तु अब तुम्हारे पास बहुत कुछ है फिर भी तुम दुखी हो यह सही नहीं हैं। तुम्हारे दुःख का कारण तुम्हारे पास कम होना नहीं है बल्कि गांव वालों के पास तुमसे ज्यादा समृद्धि होना हैं।

साधारण शब्दों में कहें तो तुम्हारें दुख का कारण तुम्हारा अपना दुःख नहीं है बल्कि दूसरों का सुख है। यह तुम्हारे मन की ईर्ष्या के कारण है। इस प्रकार के विचार जब तक तुम्हारें मन में रहेंगे तुम कभी भी सुखी नहीं हो सकते। इसलिए तुम्हें अपने विचारों को बदलने की आवश्यकता है। संसार में मनुष्य का सुख केवल अपने सुख से नहीं हो सकता उसे दूसरो की खुशियों में अपनी ख़ुशी तलासने की आवश्यकता है। यह कहकर भगवान चले गये। उस दिन से वह व्यक्ति सदैव प्रशन्न रहने लगा।

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