Monday, February 2, 2026

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चार ठगों की चालाकी भरी कहानी: बदले, बुद्धि और न्याय की अद्भुत दास्तान

चार ठगों की चालाकी भरी कहानी: बदले, बुद्धि और न्याय की अद्भुत दास्तान

चार ठगों की चालाकी : काशीपुर में आर्यन अपनी विधवा माँ के साथ रहता था। उसका बचपन दुखों से भरा था, क्योंकि उसके पिता—जो इलाके के कुख्यात ठग थे—एक दिन अपने ही साथियों द्वारा मार दिए गए। ठगी का माल बाँटने को लेकर उसके चार साथियों ध्रुव, मोहन, बलराम और रघु ने उसकी हत्या कर दी और अमरावती भाग गए।

आर्यन की माँ, कमजोर होते हुए भी, वर्षों तक अपने पति के हत्यारों के खिलाफ कुछ नहीं कर पाई। इसलिए उसने अपने बेटे को ही बचपन से चालाकी, बाजीगरी और बुद्धि के हुनर सिखाए। समय के साथ, आर्यन अठारह-उन्नीस साल का समझदार और तेज युवक बन गया।

अमरावती की यात्रा — बदले की शुरुआत

एक दिन आर्यन बोला—

माँ, अब समय गया है। मैं पिताजी के हत्यारों से बदला लेकर ही रहूँगा।”

माँ ने उसके माथे पर चंदन लगाया, नज़र उतारी और उसे मीठे पकवानों की गठरी देकर आशीर्वाद दिया।

आर्यन घोड़े पर सवार होकर कई पहाड़ों और जंगलों को पार करता हुआ अमरावती पहुँचा। सराय में व्यापारी बनकर रुका और पूछताछ करते-करते उसे चारों ठगों का ठिकाना मिल गया।

पहली चाल – “मामाजी” बनने का खेल

आर्यन ने उनके घर पहुँचकर उनके पैर छुए और बोला—

मामाजी, प्रणाम!”

चारों ठग—ध्रुव, मोहन, बलराम और रघु—हैरान रह गए।
“तुम कौन हो?”

आर्यन ने सधे स्वर में कहा—
“मैं आपकी छोटी बहन का बेटा हूँ। आप लोग तो सालों पहले यहाँ आ गए थे, मुझे कैसे पहचानोगे?”

इतना कहना था कि चारों उसे गले लगा बैठे, क्योंकि लालच के आगे उनकी बुद्धि हमेशा हार जाती थी।

दूसरी चाल – जादुई बंदर का धोखा

आर्यन अपने साथ दो बंदर लाया था—
एक हाथ में रस्सी से बंधा हुआ,
दूसरा थैले में छुपा हुआ।

ठगों ने पूछा—
“यह बंदर क्यों साथ लाए हो?”

आर्यन बोला—
यह जादुई बंदर है। संदेश देकर आता-जाता है। बहुत कीमती है।”

ठगों की आँखों में लालच चमका।
उन्होंने बंदर को खरीद लिया।

उन्होंने बंदर से कहा—
“घर जाकर कहो—मेहमान आए हैं, अच्छा खाना बनाना।”

जैसे ही बंदर को छोड़ा गया, वह जंगल भाग गया।
उधर आर्यन ने मौका देखकर थैले वाला दूसरा बंदर निकाल दिया।

ठग बोले—
“देखो! हमारा दूत लौट आया!”

जब शाम को घर पहुँचे तो खाना गायब था।
पत्नी को दोष देकर खूब डांट-फटकार हुई।
ठग बिल्कुल नहीं समझ पाए कि बंदर वही नहीं था।

तीसरी चाल – जादुई डंडा और दूसरी ठगी

कुछ दिनों बाद सब नदी पर मछली पकड़ने गए।
आर्यन बोला—

यह जादुई डंडा है। मैं बेहोश हो जाऊँ तो इसे नाक से लगाना, तुरंत होश जाएगा।”

इसके बाद आर्यन बेहोशी का नाटक करने लगा।
ठगों ने पानी के छींटे, हिलाना-डुलाना—सब किया।
कुछ काम नहीं आया।

फिर वे डंडा नाक के पास ले गए—
और आर्यन तुरंत उठ बैठा।

ठग चकित—
“यह तो सच में जादू है!”

उन्होंने मुँहमाँगी कीमत देकर डंडा भी खरीद लिया।

फिर से उन्होंने दूसरे बंदर को संदेश देकर भेजा।
और वह भी जंगल भाग गया।

घर जाकर खाना न मिलने पर ठगों ने अपनी पत्नियों को बुरी तरह पीटा।
वे मर गईं—और अब “जादुई डंडा” भी उन्हें नहीं उठा पाया।

उधर आर्यन मौका पाकर भाग गया।

अंतिम बदला – ठगों की जलसमाधि

कुछ दिनों बाद ठगों ने आर्यन को पकड़ लिया और बोरे में बंद कर नदी में फेंक दिया।
पर किस्मत आर्यन के साथ थी—एक नाविक ने बोरा खोलकर उसे बचा लिया।

कुछ समय बाद जब ठगों को बाजार में आर्यन दिखा, वे डरकर चिल्लाए—
भूत! भूत!”

आर्यन हंसते हुए बोला—
“अरे नहीं मामाजी, मैं तो जिंदा हूँ।
वह बोरा जादुई था। उसमें कोई भी बंद हो, डूबता नहीं।”

ठगों को तुरंत लालच आ गया।
वे बोले—
“वह बोरा हमें दे दो!”

उन्होंने बोरा खरीदा और खुद ही अंदर बैठ गए ताकि वह “चमत्कार” आजमाया जा सके।

आर्यन ने बोरे का मुँह कसकर बाँधा
और उसे नदी की तेज धारा में फेंक दिया।

बोरा बह गया…
और चारों ठग डूबकर मर गए।

आर्यन ने पिता का बदला ले लिया
और ढेरों धन के साथ काशीपुर लौट आया।

🌼 कहानी की सीख

  • बुद्धि और धैर्य सबसे बड़ा हथियार हैं।
  • बुराई करने वाला अंत में अपने कर्मों का फल पाता ही है।
  • सच और चतुराई मिलकर किसी भी अन्याय को खत्म कर सकते हैं।

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