Monday, February 2, 2026

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ढोंगी साधु” – सत्य और मुखौटे की कहानी

ढोंगी साधु – सत्य और मुखौटे की कहानी 

एक शहर में एक ढोंगी साधु था उस साधु में एक कला थी कि वह बोलने में बहुत माहिर थे। प्रवचन उनके बाएं हाथ का खेल था। इसलिए लिए कई लोग उनके शिष्य बन जाते हैं। कई लोग उसके पीछे-पीछे चलने लगते हैं। उसे बहुत सारा धन दान में मिलता था।

ढोंगी साधु अपने शिष्यों के साथ आश्रम में रहता था। तभी एक सेठ उनके आश्रम में आया। सेठ भी बोलने के कौशल से ढोंगी साधु से बहुत प्रभावित हुआ।

साधु से मिल कर जब सेठ अपने घर पहुँचा तो उसे एक विचार आया। दरअसल सेठ को दुविधा थी। उसके पास बहुत सारा सोना था जिसे वह चोरों के डर से अपने घर में नहीं रख सकता था। उसने सोचा कि क्यों न इस सोने को साधु के आश्रम में रख दिया जाए, क्योंकि साधु को कभी मोह नहीं होता। वह भगवान का रूप है। ऐसे देवता पर किसी को शक भी नहीं होगा कि उनके आश्रम में सोना छिपा है।

ऐसा सोचकर सेठ दूसरे दिन साधु के आश्रम में सोना लेकर गया और उसे पूरी कहानी सुनाया। फिर क्या था उस पाखंडी साधु की उस सोने की थैली से उसकी आंखें न हट सकीं। उस सेठ ने उस सोने की गठरी को आश्रम में एक पेड़ के नीचे गाड़ दिया, और वहां से चला गया।

साधु अब कहाँ सोने वाले थे? वह रात भर उस बैग के बारे में सोचता रहा। उसने सोचा कि अगर यह सोना मिल गया तो जीवन सवर जाएगा। सांसारिक सुख भी होंगे जो इस भगवा वस्त्र ने छीन लिए हैं। इस प्रकार साधु ने अनेक स्वप्न देखे। उधर सेठ आश्रम में सोना रख कर चैन की नींद सो रहा था।

कुछ समय बाद साधु ने एक योजना बनाई। उसने सोचा कि वह इस सोने को लेकर जाएगा। सेठ को कोई संदेह न हो, इसलिए वह सेठ के घर जाकर अपने घर जाने के लिए कहेगा ताकि सेठ को यह शक न हो कि साधु सोना लेकर भाग जायेगा।

अगले दिन साधु सेठ के घर गया, वहां सेठ के पास एक व्यापारी बैठा था। साधु को आते देख सेठ खुशी से उछल पड़ा और कई तरह के व्यंजन बनाकर उन्हें खिलाया । साधु ने सेठ को अपने जाने के बारे में बताया, इस पर सेठ उदास हो गया और उसे रोकने लगा, लेकिन साधु ने कहा कि वह एक संन्यासी है। और वह एक जगह बहुत दिनों तक नहीं रह सकता उसे कई लोगों का मार्गदर्शन करना पड़ता है। यह कहकर साधु बाहर चला गया। और जानबूझ कर सेठ के घर से एक तिनका उठा लिया।

थोड़ी देर बाद साधु वापस आया, यह देखकर सेठ ने उसके वापस आने का कारण पूंछा। तब साधु ने कहा कि तुम्हारे घर का यह एक तिनका मेरी धोती में लटका हुआ था और मेरे साथ जा रहा था, वही लौटाने आया हूँ। सेठ ने हाथ जोड़कर कहा – इसकी क्या जरूरत थी। तब साधु ने कहा – इस संसार की किसी भी वस्तु पर साधु का कोई अधिकार नहीं है। फिर साधु ने सेठ को अपनी बातों से मोहित कर लिया, और वहां से चला गया।

यह सब घटना सेठ के बगल में बैठा व्यापारी देख रहा था। उसने सेठ से पूंछा कि ये साधु कौन हैं? तब सेठ उसे सारी बात बताई, जिसे सुनकर व्यापारी जोर-जोर से हंसने लगा। सेठ ने व्यापारी से हंसने का कारण पूंछा। तब व्यापारी ने उससे कहा कि तुम मूर्ख हो, वह पाखंडी तुमसे तुम्हारा धन ले गया। इस पर सेठ ने कहा कि तुम कैसे बात करते हो, वह साधु है, बहुत ज्ञानी हैं।

व्यापारी ने सेठ से कहा कि अगर आप अपना सोना बचाना चाहते हैं, तो उस जगह पर चलो जहां सोना गाड़ा था। सेठ उसे वहाँ ले गया और उस जगह को खोदा लेकिन कुछ नहीं मिला। वह रोने लगा। तब व्यापारी ने उससे कहा कि रोने का समय नहीं है, जल्दी करो, वह साधु ज्यादा दूर नहीं गया होगा। सेठ और व्यापारी ने इस बात की सूचना पुलिस को दी और पुलिस ने पाखंडी साधु को पकड़ लिया। तब सभी को पता चलता है कि वास्तव में यह कोई सिद्ध बाबा नहीं था, यह एक चौर था जिसने अपनी बोलने की कला का उपयोग करके कई लोगों को लूटा था।

सोना पाकर सेठ की जान में जान आयी। सेठ ने व्यापारी से पूंछा कि उसे कैसे पता चला कि यह साधु एक होंगी है। व्यापारी ने कहा – वह साधु बार-बार अपनी तारीफ कर रहा था। वह कितना महान हैं, यह बार-बार दोहराया जा रहा था, जबकि जो सच्चे संत हैं उन्हें इस बात को दोहराने की जरूरत नहीं है। इसलिए आज के समय में साधु बनकर प्रवचन देने वाले सभी सच्चे संत नहीं होते।

🌼 कहानी से सीख (Moral of the Story) :

  • बाहरी दिखावे पर भरोसा करना खतरनाक हो सकता है—वास्तविकता उसकी आत्मा में छुपी होती है।
  • सच्चे संत वो नहीं जो केवल प्रवचन देते हों, बल्कि जिनका आचरण सत्य के अनुरूप हो। मुखौटा जल्दी खुल जाता है।

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